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Wednesday, 15 July 2020

टेक्नोलॉजी का जाल और सिकुड़ता समाज समस्या अथवा वरदान?

हर युग में समाज का अपना वजूद होता है।ताने बाने होते हैं।सभ्यता,संस्कृति विकसित होती है।
आज का समाज नई टेक्नोलॉजी,आधुनिक सुख सुविधाओं से सम्पन्न है।विज्ञान,शोध एवं विकास का युग है।दुनियाँ चाँद,मंगल ग्रह पर पहुँच चुकी है।हर बड़े देश के पास अणु बम तथा हाईटेक आर्म्स हैं।पैसा,धन है पर भावनायें मरती जा रहीं हैं।अहंकार,इर्ष्या,नफरत का बोल बाला है।पुरातन संस्कार,सभ्यता,संस्कृति से लोग दूर होते जा रहे हैं।ताकतवर देश कमज़ोर पडोसी को धमकाता है।आक्रमण करता है।हथियारों की होड़ लगी है।मानव जीवन,प्रकृति के वज़ूद को समाप्त करने के लिए प्रयास हो रहें हैं।यह कैसा आधुनिक समाज,दुनियाँ विकसित हो रही है?दुनियाँ के देश पर्यावरण को नष्ट करते जा रहें हैं।पीने के पानी की किल्लत हो रही है।भय के माहौल में लोग जी रहे हैं।
दुनियाँ के लोग,समाज,परिवार आज के माहौल में क्या सुखी हैं?खुश हैं?सुरक्षित हैं?बड़े सवाल है।सोंचने को मजबूर करते हैं।
क्या भारतीय समाज,परिवार आज के तकनीकि बदलाव के युग में तरक़्क़ी कर रहा है?सोंचने की ज़रुरत है।जिन देशों ने अपने संस्कार,इतिहास,परम्परा को छोड़ा वह मानव मशीन के रूप में तब्दील हो रहा है।जापान एक ऐसा देश है जिसने अपने रूट्स,संस्कार को जीवित रखते हुए आधुनिक,विकसित देश बना।अपने इतिहास को सहेज कर रखा है।तकनीक के ईजाद में श्रेष्ठ देश है।
              हिंदुस्तानी समाज,परिवार इकट्ठा,समूहों में रहना पसंद करता है।दादा दादी,नाना नानी,माता पिता,चाचा चाची,भाई बहन,फुआ फूफा अदि साथ रहते थे।मिलते जुलते थे।गर्मी जाड़े की छुट्टियों में पहले से घर,गाँव जाने का टिकट कटा रहता था।गर्मी के दिनों में आम खाने को मिलता था।जाड़े में भुट्टा,हराचना,होरहा अदि।बच्चे खूब आनंद करते थे।मस्ती करते थे।बड़े बुजुर्ग महिला पुरुष हंसी मजाक ख़ुशी मनाते थे।आंगन में चूल्हा जलता था।बच्चे बूढ़े साथ रोटियाँ खाते थे।अब वह माहौल एक स्वप्ना सा लगता है।हम आधुनिक बन गए है।सुख सुविधायें खूब है।वातानुकूलित कमरे है।पर गर्मियों नें छत पर खुले आसमान के नीचे सोने का जो सुख,मज़ा था वह अब शहरों में नसीब नहीं
                 दिन में घर की महिलायें अपने घर के आस पास,मुहल्लों में पडोसी के यहां आना जाना।मिलना जुलना बैठना।बातें करना।रविवार को छुट्टी के दिन एक दूसरे के घरों में आना जाना करती थीं।दोपहर में एक दूसरे के घर औरतें दिन में आती जाती थी वह सिलसिला क्यों समाप्त हो गया?अब तो पडोसी भी एक दूसरे को नहीं पहचानते।
                 नफरत के भाव टेलिविज़न,मोबाइल,नेट के ज़माने में बढ़ते जा रहे हैं।समाज हाई टेक तो हो गया पर अपने आप तक सीमित हो चुका है।बच्चे बड़े होकर बुजुर्गों,माता पिता से दूर हो रहे है।मोबाइल, इनटरनेट, सोशल साइट्स ने अपने आप में समाज को उलझा रखा है। समाजिक कार्य,सामूहिक दायित्व,गतिविधियों से हम दूर होते जा रहे है।फ्लैट्स,मुहल्लों में पडोसी को कोई नहीं पहचानता।25-30 साल पहले तक लोग मुहल्ले के कई पुश्त को लोग नाम,चेहरे से जानते,पहचानते थे।यह बदलाव क्या बता रहा है?विलासिता,शारीरिक सुख तो मिले हैं पर आत्मीयता,मानासिक शांति नहीं मिली है।यह अच्छे संकेत नहीं है।
             माता,पिता बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेज कर बड़े खुश होते हैं।वही बच्चे बुढ़ापे में माँ बाप को अकेला छोड़कर विदेश में बस जाते हैं।बहुत सारे बच्चे बड़े होकर हिंदुस्तान के बड़े शहरों में बस जाते हैं।माता पिता गाँव,छोटे शहरों में अकेले पड़े हैं।बच्चे देख भाल नहीं करते।यह कैसा आधुनिक समाज है।हम कहाँ जा रहे हैं।एक घर में चार लोग हैं।सभी मोबाइल में लगे रहते हैं।कोई एक दूसरे से कुशल क्षेम भी नहीं पूछता।स्कूल,कॉलेज,ऑफिस,दोस्त,पैसा कमाना यही मकसद रह गया है आज के आधुनिक समाज का?          परिवार,समाज,सामाजिक सरोकार,सहयोग सबसे मुँह मोड़ते जा रहे हैं हम।यह ठीक नहीं।नये ज़माने के साथ चलें।आधुनिक तकनीक,सुविधायें को अपनाएँ पर अपने रूट्स,जड़,मिटटी से जुड़े रहें।बच्चों में भारतीय संस्कार डालें। तकनीक और रिश्तों में सामंजस्य बिठाकर चलें।अपने धर्म, आस्था को प्यार से अपनायें।किसी को आपके ब्यौहार से कष्ट,परेशानी ना हो।     पारिवारिक,सामाजिक रिश्तों में गर्मजोशी बनाये रखें। भाई चारा बना रहे।विकास को अभिशाप नहीं वरदान बनायें।जीवन का आनंद मिलेगा।समय खुशी से ऐसे कटेगा,पता ही नहीं चलेगा इतना समय कैसे बीत गया।
प्रेम,दया,करूणा,क्षमा के भाव को दिल में मरने ना दें।दुनियाँ प्रेम से चलेगी,नफरत से नहीं।🌷.
अनिल कुमार सिन्हा
चर्चित चित्रकार,लेखक।
*विचार
अनिल कुमार सिन्हा-रेखा चित्र।
साईज़-12"×12"

Tuesday, 7 July 2020

लक्ष्य पाल सिंह राठौर Laxya Pal Singh Rathore अजमेर,राजस्थान की संस्कृति,समाज,लोक संस्कार को कैनवास पर उकेरते हैं।

            लक्ष्य पाल सिंह राठौर Laxya Pal Singh Rathore का जन्म स् न 1964 में अजमेर,राजस्थान में हुआ है।
इन्होंने कला महाविद्यालय,लखनऊ से स् न 1990 में आर्ट मास्टर डिप्लोमा की पढाई पूरी की है।स् न 1991-92 में डी ए भी कॉलेज अजमेर से मास्टर इन अर्ट्स किया है।इनके गुरु इनके पिता स्व.नरेंद्र पाल सिंह राठौर रहे हैं जो राजस्थान के जाने माने कलाकार थे।
राजस्थान ललित कला अकादेमी तथा आईफेक्स,नई दिल्ली द्वारा आयोजित राज्य,राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में इन्हें पुरष्कृत किया जा चुका है।इनकी एकल,समूह प्रदर्शनी देश विदेश में लगती रहती हैं।राठौर द्वारा सृजित कृतियां हिंदुस्तान के अलावा जर्मनी,स्विटरजलैंड,अमेरिका,इंग्लैंड,जापान की आर्ट गैलरी, निजी संग्रह में है।
      1990 से आजतक राठौर नियमित कला सृजन में लगे रहते हैं।अजमेर,राजस्थान की संस्कृति,समाज,लोक संस्कार,जन जीवन,रेत के टीलों पर जीने वाले मानव,समाज के यथार्थ को कैनवास पर उकेरते हैं।राजस्थन के गौरव,प्रेम,नायक नायिका की नोकझोंक,गवई परिवेश की सादगी,सच्चापन,मिट्टी की खुशबू को तस्बीरों में उकेरते हैं।बचपन से अपने परिवेश को देखा,परखा,समझा है।रेतों की ढेर पर जीने वाले समाज के दर्द को देखा है।गर्मी,ठंढ,तूफान,पानी की किल्लत फिर भी लोग खुश रहते हैं।प्रेम भाव से जीते हैं।किसी से कोई गिलवा शिकायत नहीं।मस्ती में गीत, संगीत,साफा-पगड़ी औरतों के रंग विरंगें वस्त्र,घाघरे,चोली,चुन्नी,गहने से सज़ी महिलाएँ ख़ूबसूरत माहौल बनाती है।लंबी मूछों वाले मर्द तथा इनके वाद्यय यन्त्र एकतारा,डफली,खड़ताल,पिपाडी,सारंगी,ढोल बजाते लोग शाम को पशु चराकर जानवरों,पंछियों के साथ गीत संगीत गाते बजाते घर लौटते हैं।यह नज़ारा अद्भुत होता है जिसे राठौर ने बचपन से देखा है।कलाकार के चित्रों के विषय उसके आस पास के,पसंद की हों तो कलाकृतियाँ प्रभावशाली बनती हैं।इनके चित्रों में लंबी गर्दन वाले पुरुष,महिलाएं प्रमुखता से देखी जा सकती हैं।राजस्थान वीरों की भूमि हैं।मर्दों की मूछों की आन बान शान की बात ही कुछ और है।मूछों को बड़े ही करीने से सहेजते,सवारतें हैं मर्द।इनके चित्रों में बड़ी बड़ी मूछें वाले मर्द प्रमुखता से देखे जा सकते हैं।
         राजस्थान में पशु में ऊंट,पंछी में मोर,नायक,नाईका का प्रेम,नोक झोंक की झलक वहां के गीतों में सुनी जा सकती हैं।प्रेमिका अपने प्रेमी नायक कि याद करते इन्तज़ार में यह पारंपरिक गीत गाती हैं।सैलानियों को यह गीत आकर्षित करती है।मैं पूरा गीत पाठकों के लिए यहाँ लिख दे रहा हूँ ताकि राठौर के आकृति मूलक चित्रों का आनंद लिया जा सके।समझा जा सके।

केसरिया बालम आवोनी पधारो म्हारे देश जी।
पियाँ प्यारी रा ढोला,आवोनी पधारो म्हारो देश।।

आवण जावण कह गया तो कर गया मोल अनेर।
गिनतां गिनतां घिस गई ,म्हारे अंग लियारी रेख।।
केसरिया बालम आवोनी पधारो म्हारे देश जी।

साजन साजन मैं करूँ,तो साजन जीवजड़ी।
साजन फूल गुलाब रो,संधु घडी घडी।।
केसरिया बालम आवोनी पधारो म्हारे देश जी।

मारु धारा देश में,निपजे तीन रत्न।
इक ढोल इक मरवण तीजो कुसुम रंग।।
केसरिया बालम आवोनी पधारो म्हारे देश जी।

सुपन तू सोभागियो, उत्तम धरी जात।
सो कोसा साजन बसै,आन मिलै प्रभात।।
केसरिया बालम आवोनी पधारो म्हारे देश जी।
      
          राठौर के चित्रों के विषय क्वीन,घर की ओर,सुगरकेन सेलर,नाईका,नायक,राजा,साइलेंट टॉक,माई लाईफ,बुद्धीजीवी,क्रिएटिव पोर्ट्रेट,फर्स्ट मून जैसे होते हैं।
 माध्यम तैल रंग,जल रंग,वाश पेंटिंग,ऐक्रेलिक रंग तथा सैंड ऑन पेपर है।यह सभी माध्यमों में काम करते हैं।वाश पेंटिंग्स इन्हों ने काफी संख्या में बनायी हैं जिसमें इन्हें पुरस्कृत भी किया गया है।तैल रंगों में काफी काम किया है।ब्लैक एंड वाईट रेखांकन लगातार करते रहते हैं।राजस्थान में बालू की ढेर है जिसे इन्हों ने पेपर पर प्रयोग किया है।बालू से चित्र बनायें हैं जो नयी खोज है।माध्यम बालू के कारण पेपर,कैनवास पर कृतियों में बनता,खुरदुरापन टेक्सचर सतह पर अपना प्रभाव दर्शकों को डालती है।
      राठौर चित्रों में रंगों का प्रयोग सीमित करते हैं।चित्रों  में ऑरेंज,येलो,ग्रीन,ब्लू की प्रधानता रहती है।गहरे रगों के नीचें से झांकती,उभरती रेखाएंआकृतियाँ ख़ूबसूरत दिखती है।      
राजस्थान के कलाकार लक्ष्य पाल सिंह राठौड़ के चित्रों के भाव चाहे वह प्रेम रस,वीर रस,करूणा रस के हों बड़े ही सधे अंदाज़ में पेश किया है।अपनी मिट्टी की खुशबू को खूबसूरती से उकेरा है।इनकी सादगी,सच्चाई,  भोलापन,कर्मठता,प्रेंम,करुणा,दया चित्रों में दिखता है।

अनिल कुमार सिन्हा
चर्चित चित्रकार,कला समीक्षक।


Saturday, 4 July 2020

राम सेवक शाक्या Ram Sewak Shakya लखनऊ निवासी देश के वरिष्ठ प्रकृति के चितेरे हैं।

राम सेवक शाक्या Ram sewak Shakya का जन्म मैनपुरी,भोगाँव,उत्तर प्रदेश में स् न 1949 ई.में हुआ।इंटरमीडिएट में इन्हों ने कमर्शियल अर्ट्स पढ़ा था।रेखांकन,चित्रकला के प्रति रूचि बचपन से थी।कम उम्र में पारिवारिक कारणों से भारतीय रेलवे में इन्हें वास्तु ड्राइंग-नक्शानबीस के पद पर योगदान करना पड़ा।कलाकार मन कहाँ मानने वाला था।शाक्या भारतीय समकालीन कला में अपने अभ्यास,सृजन में लग गये।प्रारंम्भ में यह आकृति मूलक चित्र बनाया करते थे।थारू आदिवासियों पर आधारित चित्रों की पहली एकल चित्र प्रदर्शनी लगाई।राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी,नई दिल्ली में 1991,1993,1994 में शाक्या रचित चित्रों को प्रदर्शित किया गया।यह नियमित सृजन में लगे रहते हैं।एकल,समूह प्रदर्शनीयाँ निजी आर्ट गैलरी प्रायोजित करती रहती हैं।शाक्या के समकालीन चित्र देश,विदेश की आर्ट गैलरी,कला पारखियों के संग्रहा में संग्रहित हैं।शाक्या के चित्रों के प्रेमी बहुत हैं जिनसे कृतियाँ लेते रहते हैं।
                  डॉ.बन्दना सहगल ने शाक्या की कला को परखा।कला जगत  में सहारा दिया।इनकी कला को तकनीकी जानकारियां दी जिसे आज भी यह चित्रों में उपयोग करते हैं।बन्दना सहगल के सहारा को शाक्या मानते हैं।बन्दना सहगल चर्चित वास्तुकार है।कई संस्थानों की यह निदेशक रहीं हैं इन्हों ने शाक्या के चित्रों में प्रिरिप्रेछ्य(Perspactive) तथा सममितीय(Isometric) इफ़ेक्टस को पहचाना जो जाने अंजाने तस्बीरों में उकेरते थे।इस कारण से इनके चित्रों की पत्तियाँ सभी एक साईज की होते हुए भी दूर से दर्शकों के सिर पर नहीं आती।इनके चित्रों की भुजा ऊँचाई,खड़ी रेखायें अद्भुत ढंग से लोपीबिंन्दू(Vanishing Point) पर आकर मिलती हैं।तस्बीरों में बहुआयाम क्रिएट करती हैं।
शाक्या के तस्बीरों में पत्तिओं की प्रमुखता होती है।छोटी,बड़ी पत्तियां बनाते है।गाँव के खेत में इन्हें बचपन में मटर के फूल पसंद आते थे।उसके रंग इन्हें भाती थीं।
                   शाक्या प्रकृति के चितेरे हैं। प्रकृति की आत्मा,आतंरिक सौंदर्य,सुबह,शाम दिन,रात में छाया, प्रकाश के कारण जो पत्तियों,पेड़,पहाड़ों,झरनों में परिवर्तन होते हैं,उन रंगों को तस्बीरों पर साधे हुए अनुपात में फैला देते हैं।कैनवास के फलक पर मखमली,सिल्की,स्मूथ सतह का अनुभव करती हैं।हल्के रंगों के साथ खेलते हुए कहीं गहरे रंग का पैच लोपिबिन्दु बनाती हैं।दर्शकों को तस्बीरों में गहराई,डेफ्थ जा भ्रम पैदा करती हैं।जिनके चित्रों में पेड़ पहाड़ों के बीच से धुंए,बादल सी आकृतियाँ महाकवि कालिदास के मेघदूत की याद दिलाती हैं।कलाकार शाक्या का मन जैसे अपनी नायिका को प्रेम सन्देश भेज रहे हों।
"जब तुम आकाश में उमड़ते हुए उठोगे तो
प्रवासी पथिकों की स्त्रियां मुह पर लटकते
हुए घुँघराले बालों को ऊपर फेंककर इस
आशा से तुम्हारी ओर टकटकी लगाएंगी
कि अब प्रियतम अवश्य आते होंगें।"
                                              *कालिदास
                रंगों के जादुगर हैं शाक्या।इनके चित्रों से श्रीकृष्ण के बांसुरी की धुन सुनाई देती हैं।श्रीकृष्ण-राधा उनकी सहेलियों के संग हंसी,ठिठोली के स्वर सुनाई देते हैं।रंगों की छठा चित्रों में मनोहारी होती है।मैं इनके तस्बीरों के रंगों को देखता रहता हूँ।यह कैनवास पर तैल रंगों में चित्र उकेरते हैं।इनके कलर पैलेट में हर रंग है।यह ब्लैक कलर में येलो मिलाकर भी काम कर लेते हैं जो इन्हें पसंद हैं।ग्रीन,ब्लू,येलो,ब्लैक,गोल्डन कलर्स के डिफरेंट सॉफ्ट टोन्स चित्रों में उकेरते हैं।जिनके हर चित्रों में रंगों का अद्भुत खेल दिखेगा।उन्मुक्त होकर यह रंगों का आनंद लेते हैं।इंद्रधनुषी रंगों की छटा शाक्या के तस्बीरों की खूबसूरती है जो दर्शन को अपने पास रोक लेती हैं।पकड़ कर बुला लेती हैं।तस्बीरों के रंग में दर्शक रंगबाज़ हो जाते हैं।रम जाते हैं।
              शाक्या प्रेमी इंसान हैं।इनके चित्रों में सात स्वर,रंग,रस हैं।रंगों में मीरी राग,कुसुमभी में प्रमुख रूप से मीरी राग में प्रेम,मिलन राग को रचना इन्हें पसंद हैं।                    राम सेवक शाक्या Ram Sewak Shakya भारतीय आधुनिक समकालीन कला के पसंदीदा कलाकार है।देश ,दुनियाँ में इनके चित्रों के चाहने वाले बहुत हैं।यह नियमित कला साधना में लगे रहते हैं।शाक्या के चित्रों का आनंद लें।
      *अनिल कुमार सिन्हा
        चर्चित चित्रकार,कला समीक्षक।